2019 में नहीं होगा राहुल बनाम मोदी, जानिए कौन होगा बीजेपी का असली दुश्‍मन

नई दिल्ली:-
 आगामी लोकसभा चुनाव को अब तकरीबन 
 एक वर्ष का समय बचा है, ऐसे में भारतीय जनता पार्टी एक    बार फिर से सत्ता में बने रहने के लिए अपनी पूरी ताकत झोंक रही है। मौजूदा राजनीतिक माहौल पर नजर डालें तो भारतीय जनता पार्टी राष्ट्रीय स्तर पर काफी मजबूत पार्टी के तौर पर दिख रही है। यूं तो कांग्रेस 2014 तक देश की सबसे बड़ी राष्ट्रीय पार्टी थी, लिहाजा माना जा रहा था कि वह   भाजपा को 2019 के लोकसभा चुनाव में सबसे बड़ी
 चुनौती देगी, लेकिन हाल-फिलहाल ऐसा होता नहीं दिख
 रहा है। भाजपा को राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस की बजाए राज्य की मुख्य पार्टियां अहम चुनौती दे रही हैं।

 
छोटे दलों ने  बढ़ाई मुश्किलें
हाल में जिस तरह से आंध्र प्रदेश ने एनडीए से अलग होने का फैसला लिया और आंध्रा को विशेष राज्य का दर्जा देने की मांग को लेकर संसद की कार्रवाई नहीं चलनी दी। टीडीपी और वाईएसआर कांग्रेस ने जिस तरह से संसद में हंगामा किया और कार्रवाई को नहीं चलने दिया, जिसके चलते राष्ट्रीय मीडिया में यह खबर सुर्खियां बनी थी। वहीं तमिलनाडु की एआईएडीएमके ने कावेरी जल विवाद को लेकर जमकर नारेवाबीज की। इन तमाम पार्टियों के बीच भाजपा सरकार के खिलाफ अविश्ववास प्रस्ताव की मांग भी उठी, जिसने पार्टी के लिए चिंता जरूर खड़ी की है।


उत्तर प्रदेश ने कठिन किया रास्ता 
 उत्तर प्रदेश के उपुचुनाव में जिस तरह से सपा और बसपा 
 25 साल के बाद साथ आए और भाजपा को दोनों लोकसभा  सीट पर हार का सामना करना पड़ा है, उसने यह साफ कर  दिया है कि क्षेत्रीय पार्टियां एकजुट होकर भाजपा के लिए 
 बड़ी चुनौती खड़ी कर सकती हैं। यहां गौर करने वाली बात है  कि पिछले यूपी विधानसभा चुनाव में कांग्रेस और सपा ने साथ  मिलकर चुनाव लड़ा था, जोकि पूरी तरह से विफल रहा था। ऐसे में भाजपा के लिए सबसे बड़ी चुनौती 2019 के लोकसभा चुनाव में बड़ी क्षेत्रीय पार्टियां हैं।


13 बड़े राज्य निर्णायक
13 बड़े राज्यों की 430 लोकसभा सीटों ने पिछले चुनाव में    काफी अहम भूमिका निभाई, जिसके चलते भाजपा को
 इन राज्यों में 281 सीटों पर जीत मिली। कुल छह राज्यों में भाजपा सीधे तौर पर कांग्रेस के विरुद्ध चुनाव लड़ रही थी जिसमे गुजरात, राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र, कर्नाटक शामिल हैं। इन राज्यों में कुल 166 सीटें हैं, जिसमे 
से भाजपा को 2014 में 147 सीटों पर जीत मिली थी। 
वहीं उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, हरियाणा, दिल्ली की बात
 करें तो यहां की 26 में से 23 सीटों पर भाजपा ने कब्जा किया था, जिसके चलते भाजपा की संख्या 170 से बढ़कर 192 तक पहुंच गई थी।

इन राज्यो में है सबसे मुश्किल चुनौती -
बाकी की 264 सीटों की बात करें तो यह सबसे अधिक लोकसभा सीटें देने वाले राज्य हैं, जिसमे उत्तर प्रदेश 
(80), बिहार(40), पश्चिम बंगाल(42), ओडिशा(21), 
आंध्र प्रदेश(25), तेलंगाना(16), तमिलनाडु(39), हैं, 
जिसमे से 107 पर भाजपा ने जीत दर्ज की थी। लिहाजा भाजपा के लिए इन राज्यों का चुनाव काफी अहम है। इन राज्यों में इस प्रदर्शन को दोहराना भाजपा के लिए सबसे 
बड़ी चुनौती है। इसकी बड़ी वजह यह है कि इन
 राज्यों में क्षेत्रीय पार्टियों का काफी दबदबा है, लिहाजा अगर
 यह दल एकजुट होते हैं 
तो भाजपा के लिए जीत की राह मुश्किल हो सकती है।


                  छोटे दल पड़ेंगे भारी 
मौजूदा स्थिति को देखा जाए तो भाजपा को यूपी में
 सपा-बसपा के खिलाफ, बिहार में राजद और जदयू के खिलाफ, पश्चिम बंगाल में टीएमसी और लेफ्ट पार्टियों के खिलाफ, ओडिशा में बीजू जनता दल के खिलाफ कड़ा मुकाबला करना पड़ेगा। वहीं आंध्र प्रदेश और तमलिनाडु में भी भाजपा को टीडीपी और केसीरआर की पार्टी का 
मुकाबला करना पड़ेगा। बहरहाल यह देखने वाली बात 
होगी कि इन क्षेत्रीय पार्टियों के खिलाफ भाजपा क्या 
रणनीति बनाती है।
                    
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